Accessibility Page Navigation
Style sheets must be enabled to view this page as it was intended.
The Royal College of Psychiatrists Improving the lives of people with mental illness

 

शोक संतप्तता

Bereavement

 

 

 

इस पुस्तिका के बारे में (About this leaflet)

यह पुस्तिका उन लोगों, उनके परिवार जन, मित्रों या कोई भी और व्यक्ति जो ज्यादा जानना चाहता है के लिए है।

इस पुस्तिका में आप सूचना पायेंगे कि किसी को खोने के बाद लोग सामान्यत: कैसे व्यथित होते है।

 

  •  व्यथा जिसका समाधान न हुआ हो
  •  मदद लेने के स्थान
  •  जानकारी के अन्य स्त्रोत
  •  दोस्त और सम्बन्धी कैसे मदद कर सकते है।

 

परिचय (Introduction)

    शोक संतप्तता बहुत ही परेशान करने वाला लेकिन सर्वसामान्य अनुभव है। कभी न कभी हम मे से ज्यादातर लोगों को किसी प्रियजन की मृत्यु का कष्ट उठाना पड़ता है। फिर भी हम रोजमर्रा की जिन्दगी मे मृत्यु के बारे में बहुत कम सोचते और बातें करते है। क्योंकि शायद, हम अपने बुजुर्गों की अपेक्षा इसका सामना कम करते है। उनके लिए भाई-बहन, मित्र या रिश्तेदार की मृत्यु उनके बचपन या किशोरावस्था का सर्वसामान्य अनुभव है। लेकिन हमारे लिये यह वियोग प्रायः जीवन में देरी से होते है। इसलिये हमको शोक संतप्तता के बारे में जानने का मौका कम मिलता है कि कैसे महसूस होता है ? किन ठीक चीजों को करना चाहिए ? सामान्य क्या है ? या इसका सामना कैसे करें? इसके बावजूद जब हम अपने किसी प्रियजन की मृत्यु का सामना करते है तो हमें इससे निपटना पड़ता है।

 

व्यथा (Grieving)

हम किसी भी नुकसान के बाद व्यथित होते है लेकिन किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद सबसे ज्यादा । यह केवल एक संवेदना नही है बल्कि समग्र क्रमशः संवेदनायें है जिनमे गुजरने मे कुछ वक्त लगता है और उसमें जल्दी नही की जा सकती।

हम ज्यादातर उनके लिए व्यथित होते है जिन्हें हम कुछ समय से जानते है फिर भी ये स्पष्ट है कि वो लोग जिनका बच्चा जन्म के समय मर गया या गर्भपात हो गया या जिन्होनें अपना बहुत ही छोटा बच्चा खो दिया, समान तरीके से व्यथित होते है और उन्हे उसी तरीके की देखभाल और ध्यान की जरुरत होती है।

अपने निकट सम्बन्धी या मित्र की मृत्यु के कुछ घण्टों या दिनों बाद ज्यादातर लोग साधारणतया हक्के बक्के से हो जाते हैं जैसे वो इस बात की वास्तविकता पर विश्वास नही कर पाते है। वे म्रृत्यु की आशंका होने पर भी ऐसा महसूस कर सकते है। इस तरह की भावशून्यता का भाव सारे महत्वपूर्ण व्यवहारिक इंतजाम मे सहायक हो सकता है जैसे सम्बन्धियों के सम्पर्क मे रहना और दाह संस्कार का इन्तजाम करना।

हालाँकि असत्यतता का यह अहसास अगर ज्यादा समय तक चलता है तो समस्या बन सकता है। कुछ लोगो के लिये व्यक्ति के शरीर को देखना इससे उबरने की शुरुआत करने का एक महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है। इसी प्रकार ज्यादातर लोगों के लिये दाह संस्कार अथवा स्म्रति कार्य के अवसर पर सच्चाई के अहसास की शुरुआत होती है।

मृत व्यक्ति के दाह संस्कार को देखना दुख दाई हो सकता है लेकिन अपने प्रियजनों को अलविदा कहने के यही तरीके हैं। कभी-2 ये बातें बहुत ही कष्टकारी होती है और इस लिए नहीं की जाती हैं। हालाँकि भविष्य मे इससे बहुत ज्यादा पछ्तावे का अहसास हो सकता है।

यद्यपि शीघ्र ही यह उदासीनता गायब हो जाती है और उसकी जगह पर उत्तेजना का अप्रिय भाव, मरे व्यक्ति को पाने की ललक और उनकी अत्यधिक याद आती है। उनको किसी भी तरह से पाने का अहसास होता है यद्यपि ये स्पष्ट रुप से असम्भव है। इसकी वजह से निश्चिन्त होना और ध्यान केन्द्रित करना मुश्किल होता है। और ठीक से सोना मुश्किल हो सकता है। बहुत परेशान करने वाले सपने भी आ सकते है।

कुछ लोग महसूस करते हैं कि वो हर जगह गली में, पार्क में, घर में और जहाँ भी उन्होने उनके साथ समय व्यतीत किया है,जाते हैं तो उनके प्रियजन उनको दिखाई देते है। प्रायः लोगो को डाक्टर और नर्सें जो उनकी म्रृत्यु नही रोक सके मित्र और सम्बन्धी जिन्होंने पर्याप्त मदद नही की और यहाँ तक कि वो व्यक्ति जो उन्हे छोंड़ कर चला गया है के प्रति बहुत गुस्सा आता है।

दूसरी सामान्य भावना अपराध बोध है। लोगों के दिमाग मे हर समय यह विचार आते है कि वो क्या करना चाहते थे? और उन्होंने क्या किया? वे यहाँ तक सोचते हैं कि अगर उन्होने कुछ अलग तरीके से किया होता तो वो म्रृत्यु को रोक सकते। निश्चिन्त रुप से, म्रृत्यु प्रायः किसी के नियन्त्रण के बाहर होती है और एक शोकसन्तप्त व्यक्ति को इस बात की याद दिलाने की जरुरत हो सकती है। कुछ लोग अपराध बोध से ग्रसित हो सकते है, अगर वे इस बात मे राहत महसूस करें कि उनके प्रियजन एक कष्टकारी और पीड़ा भरी बीमारी के बाद मर गये है। यह राहत की भावना भी स्वाभाविक समझने योग्य और बहुत ही सामान्य है।

यह उत्तेजना का भाव साधारणतया म्रृत्यु के 2 सप्ताह बाद बहुत तीव्र होता है लेकिन शीघ्र ही काफी उदासी, डिप्रेशन, एकांत और शान्ति की भावना में बदल जाता है। भावों का यह अचानक परिवर्तन मित्रों और रिश्तेदारों को विस्मित कर सकता है। लेकिन यह दुःख की साधारण प्रक्रिया का भाग है। यद्यपि उत्तेजना कम होती है लेकिन उदासी ज्यादा जल्दी होने लगती है और सबसे ज्यादा 4-6 हफ्ते के बीच मे होती है। वस्तुएँ, स्थान और लोग जो मरे व्यक्ति की याद दिलाते हैं से दुःख के तीव्र दौर मे किसी भी समय आ सकते है।

अन्य लोग को समझने मे दिक्कत या शर्मिंदगी होती है जब वे शोक संतप्त  व्यक्ति के बिना किसी कारण के आँसुओ मे डूबा पाते है। इस परिस्थिति में, उस व्यक्ति को अन्य लोगो जो उनका दुःख समझ और बाट नहीं सकते से दूर रखने की इच्छा होती है। हालाँकि लोगों से परहेज दुःख को भविष्य मे बढ़ावा दे सकता है। और प्रायः उनको हफ्ते दो हफ्ते में अपनी दिनचर्या मे वापस आ जाना सबसे अच्छा होता है।

ऐसे समय में दूसरों को ऐसा लगता है कि शोक संतप्त व्यक्ति ज्यादातर समय बैठे रहने में और कुछ न करने मे व्यतीत कर रहा है। वास्तविकता में वो उस व्यक्ति के बारे में और जो अच्छा या बुरा समय उन के साथ व्यतीत किया है को बार-2 सोचतें हैं यह म्रृत्यु से समझौता करने का शांत और आवश्यक भाव है।

जैसे-जैसे समय व्यतीत होता है शुरूआती शोक संतप्ता की तीव्र पीड़ा कम होने लगती है। उदासी कम होती है और दुसरी चीज़ों और भविष्य तक के बारे में सोचना सम्भव हो जाता है। शोक संतप्त व्यक्ति को लगातार अपने नयी एकाकीपन की याद आती है। जब वो दूसरे दम्पतियों को साथ में एवं मीडिया में सुखी परिवारों की धोखा देने वाले चित्र देखते है। कुछ समय बाद पुन: सम्पूर्ण महसूस करना सम्भव हो जाता है हालाँकि, एक भाग तो चला गया है। यद्यपि कई सालों के बाद आप अपने आपको उनसे बात करते हुए पा सकते हैं जैसे कि वो अभी भी आपके साथ है।

मातम के विभिन्न चरण अक्सर कुछ अंश तक एक दूसरे को ढक लेते हैं और विभिन्न लोगों मे विभिन्न होते हैं। ज्यादातर लोग बहुत बड़ी शोक संतप्ता से 1 या 2 साल मे उबर जाते हैं। म्रृत व्यक्ति को जाने देने और जीवन को नये तरीके से शुरूआत करना दुःख का अन्तिम चरण है। दूसरी पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं। नींद बेहतर हो जाती है ऊर्जा सामान्य हो जाती है। यौन भावनाएँ जो कुछ समय के लिए गायब हो चुकी थी वापस आ जाती है यह सामान्य है और शर्मिन्दगी की बात नही।

इतना सब कहने के बाद, व्यथा का कोई “मानक” नही है। हम सब अलग-अलग व्यक्ति हैं और सबकी अपने व्यथा के अपने तरीके हैं।

इसके अतिरिक्त, अलग-अलग सभ्यता के लोग म्रत्यु का सामना अलग तरीके से करते हैं,सदियों से, दुनिया के अलग-अलग भागों के लोगों ने म्रृत्यु से निपटने के लिए उनके अपने संस्कार बनाये है।

कुछ समूहों में म्रृत्यु को जीवन-मरण के लगातार चक्र के एक चरण की तरह देखते हैं ना कि एक अन्त की तरह।

मातम के संस्कार और कर्मकाण्ड बहुत दिखावटी और सार्वजनिक हो सकते हैं। गोपनीय और शान्त तरीके से कुछ सभ्यताओं में, मातम का समय निश्चित होता है कुछ में नही।

अलग–अलग सभ्यताओं मे शोक संतप्त व्यक्ति की भावनाएँ एक समान हो सकती है लेकिन उनको प्रकट करने का तरीका बहुत भिन्न होता है।

 

बच्चे और किशोर (Children and adolescents)

यद्यपि बच्चे जब तक 3-4 साल के हो, हो सकता हैं कि वे म्रृत्यु का मतलब न समझ सके। उनमें भी किसी रिश्तेदार के खोने का अहसास बड़ों की तरह हो सकता है। यह स्पष्ट है कि नवजात शिशुओं और बच्चों को भी व्यथा और इसमें अत्यधिक दुःख का अहसास होता है।

हालाँकि बड़ों की अपेक्षा समय की भिन्नता होती है और वे मातम के सारे चरण का भी जल्दी पार कर लेते है। विद्यालय के शुरूआती वर्षों में बच्चे किसी करीबी रिश्तेदार के म्रृत्यु की जिम्मेदारी महसूस कर सकते हैं इसलिए उनको आश्वासन की जरूरत हो सकती है। छोटे लोग इस भ्रम से कि वो अपने चारों-ओर के बड़ों का दुःख न बढायें इस बारे बात नहीं करते हैं बच्चों और किशोरों के दुःख की व्यथा और उनके मातम की आवश्यकता को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। जब परिवार मे किसी व्यक्ति की म्रृत्यु हुयी हो, प्रायः उनको दाह संस्कार की व्यवस्थाओं में शामिल किया जाना चाहिए।

 

रिश्तेदार और मित्र कैसे सहायता कर सकते हैं ? (How can friends and relatives help?)
  •  शोक संतप्त व्यक्ति के साथ समय व्यतीत करके आप उसकी सहायता कर सकते हैं। शब्दों से ज्यादा उनको जानना आवश्यक होता है कि कष्ट और पीड़ा के इस वक्त में आप उनके साथ होंगे। जब पर्याप्त शब्द न हो तो संवेदनापूर्वक कंधे पर हाथ रखना सहायता प्रकट करेगा।
  •  यह महत्वपूर्ण है कि अगर वे चाहें तो शोक संतप्त व्यक्ति किसी के पास रो सकते हैं बिना उनको अपनी मदद करने के लिए कहने के बजाय और अपनी पीड़ा और कष्ट की भावनाओं के में बात कर सकते हैं। समय के साथ, वो समझौता कर लेंगे लेकिन, शुरुआत में उनकी बात करने और रोने की आवश्यकता होती है।
  •  दूसरों के लिए यह समझ पाना बहुत मुश्किल होता है कि शोक संतप्त व्यक्ति को एक ही बात बार-बार करनी पड़ती है लेकिन यह दुःख से निपटने का एक भाग है और इसको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अगर आपको क्या कहना है ये आपको नही पता है या इसके बारे में बात करें या न करें नही जानते, ईमानदार रहते हुए ऐसा कह दें। इससे शोक संतप्त व्यक्ति को आपको बताने का मौका मिलता है कि वो क्या चाहता/चाहती है। लोग प्रायः म्रृत व्यक्ति का नाम लेने से बचते हैं इस भय से कि यह परेशान कर देगा। हालाँकि शोक संतप्त व्यक्ति को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि और लोग उसकी हानि को भूल गये हैं। इससे व्यथा के दुःख दायी एहसास का एकाकीपन बढ़ता है।
  •  याद रखें कि त्योहार और वर्षगाँठ (केवल म्रत्यु की ही नही बल्कि जन्म और शादी की) विशेषकर दुःखदाई समय होता है। मित्र और रिश्तेदार उनको पास रहने का विशेष प्रयास कर सकते हैं।
  •  व्यवहारिक सहायता जैसे सफाई, खरीदारी और बच्चों की देखभाल अकेलेपन के बोझ को कम कर सकते हैं। शोक संतप्त जीवनसाथी को ऐसे काम जो ( बिल, खाना बनाना, घरेलू कार्य, कार की सर्विसिंग इत्यादि ) जो म्रत जीवनसाथी सँभालता था उसके लिए सहायता की जरुरत हो सकती है।
  •  व्यथित लोगों को पर्याप्त समय देना महत्वपूर्ण होता है। कुछ लोग शीघ्र ही इस नुकसान से उबर जाते हैं लेकिन अन्य लोगों को ज्यादा समय लगता है। इसलिए बहुत अधिक व जल्दी उम्मीद न करें। शोक संतप्त मित्र और रिश्तेदार से उनकी व्यथा से ठीक ढंग से निपटने के लिए समय की आवश्यकता होती है और यह उनको भविष्य में समस्याओं से बचने मे सहायक होगा।

 

दुख जिसका समाधान न हुआ हो
(Grief that is unresolved)

कुछ लोग कभी मुश्किल से ही व्यथित दिखायी पड़ते है। वे दाह संस्कार के समय नहीं रोते हैं और अपनी हानि के जिक्र से परहेज करते है और अपनी दिनचर्या मे अति शीघ्र वापस आ जाते हैं। यह उनका हानि से निपटने का सामान्य तरीका है। और इसके परिणाम खतरनाक नहीं होते। लेकिन अन्य लोग विचित्र शारीरिक लक्षणों से पीड़ित हो सकते हैं या आने वाले सालों मे उनको उदासी के बार- बार दौरे हो सकते हैं। कुछ लोगों को व्यथा से ठीक ढंग से निपटने का अवसर नही मिल सकता है। परिवार की देखभाल और व्यवसाय कि भारी जिम्मेंदारी का मतलब हो सकता है कि यहाँ बिलकुल समय नही है।

कभी-कभी समस्या यह होती है कि नुकसान को उपयुक्त शोकसंतप्ता नही समझा जाता है। ऐसा अक्सर लेकिन हमेशा नही होता है उन लोगों के साथ जिन्हे गर्भपात या मरा बच्चा पैदा होता है। पुनः इसके उपरान्त डिप्रेशन का समय आ सकता है।

कुछ लोग व्यथित होना शुरु कर सकते है लेकिन फिर यह प्रक्रिया रुक जाती है। शुरुआती सदमे और अविश्वास की भावनायें चलती ही जाती है सालों बीत जाते हैं लेकिन इसके बाद भी पीड़ित व्यक्ति के लिए यह मानना बहुत मुश्किल होता है कि उनके प्रियजन की म्रत्यु हो गयी है। अन्य लोग का कुछ भी और ना सोच पाना जारी रहता है। प्रायः वो म्रत व्यक्ति के कमरे उनकी यादों का एक प्रकार का मकबरा बना लेते हैं।

कभी-कभी हर शोकसंतप्ता के बाद जो डिप्रेशन होता है वो इतना गहरा हो सकता है कि खाने-पीने तक से परहेज हो जाता है और आत्महत्या के विचार आते हैं।

 

आपको डाक्टर द्वारा मदद
(Help from your doctor)

  •  कभी-कभी रात में नींद न आना एक समय तक चल कर एक गम्भीर समस्या बन सकता है।
  •  अगर डिप्रेशन गम्भीर होता चला जाता है भूख, नींद और ऊर्जा को प्रभावित करता है तो एंटी डिप्रेसेन्ट प्रभावी हो सकते हैं। अधिक जानकरी के लिए हमारी एंटी डिप्रेसेन्ट की पुस्तिका देखें। अगर डिप्रेशन फिर भी नही ठीक होता तो आपका जी0 पी0 आपको मनोचिकित्सक से मिलाने का प्रबंध कर सकता है।
  •  अगर कोई व्यक्ति व्यथा से उबरने में असमर्थ है तो जी0 पी0 या धार्मिक या बहुमूल्य सेवी संस्था में से किसी एक से मदद का इंतजाम किया जा सकता है। कुछ के लिए, ऐसे लोगों जो समान अनुभव से गुजर चुके हों से मिलना और बात करना पर्याप्त होगा। अन्य लोगों की या तो विशेष समूह या कुछ समय केवल अपने लिए शोकसंतप्ता काउन्सिलर या साइकोथिरैपिस्ट की आवश्यकता होती है।
  •  शोकसंतप्ता हमारे संसार मे उथल-पुथल कर देती है और यह सबसे ज्यादा दुखदायी अनुभव करते हैं मे से एक हैं। यह, भयानक और अत्यधिक हो सकता है। इसके बावजूद यह जीवन का एक हिस्सा है जिससे हमें गुजरना पड़ता है और प्रायः डाक्टरी सेवाओं की जरुरत नहीं पड़ती है।
  •  वो लोग जिनको परेशानी होती है उनको न केवल चिकित्सीय बल्कि संस्थागत सेवायें जो नीचे सारणीबद्व है सुगमता से उपल्बध है।  

 

For a list of references and further reading visit the English version of this leaflet.


The original leaflet was produced by the RCPsych Public Education Editorial Board. Series Editor: Dr Philip Timms.
Translated by Dr Anil Nischal & Dr Adarsh Tripathi. Reviewed by Dr Ashok Kumar & Dr Bharat Saluja.

  • Original leaflet updated: Feb 2008
  • Date of translation: June 2008


RCPsych logo

© 2008 Royal College of Psychiatrists. This leaflet may be downloaded, printed out, photocopied and distributed free of charge as long as the Royal College of Psychiatrists is properly credited and no profit is gained from its use. Permission to reproduce it in any other way must be obtained from the Head of Publications. The College does not allow reposting of its leaflets on other sites, but allows them to be linked to directly.

 

For a catalogue of our resources please contact: Leaflets Department, The Royal College of Psychiatrists, 17 Belgrave Square, London, SW1X 8PG

Charity Registration Number 228636 in England and Wales and SCO38369 in Scotland.

 

Please note that we are unable to offer advice on individual cases. Please see our FAQ for advice on getting help.

feedback form feedback form

Please answer the following questions and press 'submit' to send your answers OR E-mail your responses to dhart@rcpsych.ac.uk

On each line, click on the mark which most closely reflects how you feel about the statement in the left hand column.

Your answers will help us to make this leaflet more useful - please try to rate every item.

 

This leaflet is:

Strongly agree

Agree

Neutral

Disagree

Strongly Disagree

  Strongly Agree Strongly Agree Agree Neutral Disagree Strongly Disagree Strongly Disagree
Readable
           
Useful
           
Respectful, does not talk down
           
Well designed
           

Did you look at this leaflet because you are a (maximum of 2 categories please):

Age group (please tick correct box)